चुम्बक किसे कहते हैं? इसके गुण तथा प्रयोग,1-ओस्टर्ड का प्रयोग 2-बायो सेवर्ट का नियम क्या है?

चुम्बक

मैग्नेटाइट नामक पत्थर के अंदर हल्के लोहे के टुकड़े को अपनी तरफ आकर्षित करने का गुण होता है जिसे चुम्बक कहते हैं।

  • चुंबक जिस गुण से लोहे के टुकड़े को अपनी तरफ आकर्षित करता है उसे चुंबकत्व कहते हैं।
  • चुंबक का रासायनिक सूत्र Fe3O4 होता है ।
  • चुम्बक दो प्रकार के होते हैं ।

प्राकृतिक चुम्बक

प्राकृतिक में पाए जाने वाली चुम्बक प्राकृतिक चुम्बक कहलाते हैं।

कृत्रिम चुम्बक

कृत्रिम विधि द्वारा बनाए गए चुम्बक कृत्रिम चुम्बक कहलाते हैं।

जैसे – छड़ चुम्बक, घोड़ा नाल चुम्बक, चुम्बकीय सुई।

चुम्बक के गुण(quality of magnet)

चुंबकीय आकर्षण शक्ति उसके के दोनों किनारों पर सबसे अधिक एवं मध्य में सबसे कम होता है।

  • चुंबक के किनारे के दोनों सिरों को चुंबक के ध्रुव कहते हैं।

दिशात्मक गुण ( directional property)

यदि किसी चुंबक को धागे से बांधकर मुक्त रूप से लटका दिया जाए तो स्थिर होने पर इसका एक ध्रुव उत्तर की ओर तथा दूसरा ध्रुव दक्षिण की ओर हो जाता है।

  • जो ध्रुव उत्तर की तरफ ठहरता है उसे उत्तरी ध्रुव या धनात्मक ध्रुव कहते हैं तथा जो दक्षिण की तरफ ठहरता है उसे ऋणात्मक ध्रुव या दक्षिणी ध्रुव कहते हैं।

चुम्बकीय अक्ष

चुम्बक के दोनों ध्रुव को मिलाने वाली रेखा चुम्बकीय कहलाती है।

चुम्बक की लम्बाई

चुम्बक के दोनों ध्रुवों के बीच की दूरी चुम्बक की लम्बाई कहलाती है।

ध्रुवों का आकर्षण एवं प्रतिकर्षण

चुम्बक का सामान ध्रुव एक दूसरे को प्रतीकर्षित करते हैं तथा विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं

  • एक अकेले चुंबकीय ध्रुव का कोई अस्तित्व नहीं होता
  • चुम्बक को मार्गदर्शक पत्थर भी कहा जाता है।

चुम्बकीय क्षेत्र

चुम्बक के चारों ओर क्या हुआ चित्र जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सके चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है

1गौस = 10-4 टेस्ला होता है ।

चुम्बकीय बल रेखा

चुम्बकीय क्षेत्र में बल रेखाएं वह काल्पनिक रेखाएं होती हैं जो उस स्थान में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का सतत प्रदर्शन करती है चुम्बकीय बल रेखा के किसी भी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

चुम्बकीय बल रेखाओं के बीच गुण

  • चुम्बकीय बल रेखाएं चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं तथा वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश कर जाती हैं और चुम्बक के अंदर से होती हुई पुनः उत्तरी ध्रुव पर वापस आती हैं।
  • दो बल रेखाएं एक दूसरे को कभी नहीं काटती हैं
  • चुंबकीय क्षेत्र जहां प्रबल होता है बल रेखाएं वहां आसपास होती हैं
  • एक समान चुम्बकीय क्षेत्र की बल रेखाएं परस्पर समांतर एवं बराबर बराबर दूरियों पर होती हैं।

ओस्टर्ड का प्रयोग (osrsted’s Experiment)

इस प्रयोग में एक चालक तार AB को दान कुंजी के द्वारा बैटरी के ध्रुव से जोड़ा जाता है तथा इस तार को एक चुम्बकीय सुई के ऊपर सुई के समांतर रखा गाया है जब तक तार में विद्युत धारा नहीं बहती सुई तार के समान बनी रहती है जैसे ही कुंजी में दबाकर तार में वैद्युत धारा प्रवाहित करते हैं चुमूबकीय सुई विक्षेपित हो जाती है अतः इस प्रयोग से सिद्ध होता है कि वैद्युत धारा या गतिमान आवेश अपनी चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।

बायो सेवर्ट का नियम

इस नियम के अनुसार किसी धारावाही चालक के लघु अवयव के किसी बिन्दु P पर उत्पन चुम्कीय क्षेत्र का मान ट्रैंगल B निम्न कारको पर निर्भर करता है –

(1) – यह चालक के प्रवाहित धारा के समानुपाती होता है।
ΔB ∝ i

(2)- यह चालक के अवयव की समानुपाती होता है
ΔB ∝ Δl

(3)- यह बिन्दु p की अवयव से दुरी r के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

ΔB ∝ 1/r2

(4)- यह अवयव की लम्बाई तथा हां अवयव को बिंदु P से मिलाने वाले रेखा के बीच बनने वाले कोण की ज्या (θ) के समानुपाती होता है।

ΔB ∝ Δ1/sinθ

उपर्युक्त चारों नियमों को मिलाने पर

ΔB ∝ i Δlsinθ/r2

ΔB ∝μ0 /4π i Δlsinθ/r2

अनंत लंबाई के ॠजुरेखीय की धारावाही चालक के समीप चुंबकीय क्षेत्र

अनंत लंबाई के ॠजुरेखीय चालक में विद्युत धारा i प्रवाहित होने के कारण चालक लंबवत r दूरी पर स्थित बिंदु p पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता

B ∝μ0i /2πr

Note चुंबकीय बल रेखा तथा विद्युत बल रेखा मे यह अंतर होता है की विद्युत बल रेखाएं बंद पास एवं खुला पास दोनों बनाता है लेकिन चुंबकीय बल रेखाएं केवल बंद पास ही बनाता है

चुम्बकशीलता

पदार्थ का वह गुण जिसके कारण उसके भीतर चुंबकीय बल रेखा की संख्या बढ़ या घट जाती है चुम्बकशीलता कहलाता है

एलमुनियम की चुम्बकशीलता लोहे से कम होती है

चुम्बकीय पदार्थ के प्रकार

महान वैज्ञानिक फैराडे ने बताया कि दुनिया का प्रत्येक पदार्थ चुंबकीय पदार्थ होता है

चुंबकीय प्रभाव के आधार पर इन को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है

1- प्रति चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर प्रतिकर्षीत होते हैं उन्हें प्रति चुंबकीय पदार्थ का जाता है

जैसे – Zn ,Au ,Pb ,H2o , etc

2- अनु चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर हल्का सा आकर्षित होता है उसे अनु चुंबकीय पदार्थ कहते हैं

जैसे – प्लैटिनम, क्रोमियम ,सोडियम etc..

3- लौह चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर पूरी तरह आकर्षित होता है उसे लौह चुंबकीय पदार्थ कहते हैं

प्राकृतिक चुंबक

प्राकृतिक में पाए जाने वाला चुंबक होता है

जैसे- मैग्नेटाइट

सीधे धारावाही चालक तार का चुंबकीय क्षेत्र

जब किसी तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो उसके चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।

किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होने पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र पैटर्न चालक के आकृति पर निर्भर करता है।

धारावाहिक परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र

परिनालिका एक लंबी कुंडली को कहते हैं

  • परिनालिका बेलनाकार नलिका के ऊपर तांबे या अन्य सुचालक पदार्थ के तारों के बहुत से फेरों को आसपास लपेटकर बनाई जाती है
  • जब इस परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तू यह एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करने लगती है
  • परिनालिका के भीतर प्रत्येक स्थान पर चुंबकीय क्षेत्र समान होता है
  • परिनालिका के कारण चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता निम्न बातों पर निर्भर करती है

1- परिनालिका गेम कुंडली में फेरों की संख्या बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ जाती है ।

2- धारा का मान बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ जाता है

3- परिनालिका के अंदर खाली भाग में लोहे का क्षण रखने पर चुंबकीय क्षेत्र प्रबल हो जाता है।

धारावाही परिनालिका एवं छड़ चुंबक में समानता

धारावाहिक परिनालिका एवं छड़ चुंबक दोनों स्वतंत्रता पूर्वक लटकाए जाने पर सदैव उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरता है

धारावाहिक परिनालिका एवं छड़ चुंबक दोनों के निकट चुंबकीय सुई लाने पर सुई विक्षेपित हो जाती है

Note- चालक तार के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा धारा के दिशा पर निर्भर करता है

मैक्सवेल का दक्षिणावर्ती पेंच का नियम

यदि किसी पेंच को दक्षिणावर्त घुमाया जाए तो पेंच की नोक आगे जाती है तथा पेंच को वामावर्त घुमाने पर पेंच नोक पीछे आती है।

यदि पेंच के नोक की गति ई दिशा चालक में विद्युत धारा की दिशा को व्यक्त करें तो पेट के घूर्णन की दिशा चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा होगी।

दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम

इसके अनुसार यदि दाहिने हाथ के उंगलियों को चालक के चारों ओर लपेटा जाए की अंगुलियों की लंबवत फैले अंगूठे की दिशा चालक में धारा की दिशा की ओर हो तो उंगलियों की लपेटने की दिशा चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा होगा ।

चुंबकीय क्षेत्र के कारण धारावाही चालक पर बल

यदि हम चुंबकीय क्षेत्र में किसी धारावाही चालक को रखे तो इस चालक पर बल लगने लगता है इस बल की दिशा चुंबकीय क्षेत्र तथा धारा दोनों के लंबवत होता है।

F = iblsinθ

बाएं हाथ की हथेली का नियम no 2

यदि हम अपने दाएं हाथ का पंजा पूरा फैला कर इस प्रकार रखें कि अंगूठा धारा की दिशा में तथा फैली हुई उंगलियां बाहरी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में हो तो चालक पर लगने वाला बल हथेली के लंबवत हथेली से धक्का देने की दिशा में होगा

फ्लेमिंग का बाएं हाथ का नियम

यदि हम अपने बाएं हाथ की अंगूठे तथा उसके पास वाली दोनों उंगलियां इस प्रकार फैलाएं की तीनों एक दूसरे के लंबवत रहे हैं तब यदि पहली उंगली चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और बीच वाली उंगली धारा की दिशा को बताती है तू अंगूठा चालक पर लगने वाला बल की दिशा होगा

विद्युत मोटर

विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करती है

सिद्धांत

जब किसी कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो उस पर एक बल युग्म कार्य करने लगता है यदि कुंडली अपने आज के परित घूमने के लिए स्वतंत्र है तो वह इस बल युग्म के कारण चुंबकीय क्षेत्र में घूमने लगती है

रचना

इसके निम्न प्रमुख भाग हैं-

1- क्षेत्र चुम्बक

यह एक शक्तिशाली विद्युत चुंबकNs है जिसकी कुंडली मैं दृष्टि धारा प्रवाहित की जाती है इसी से प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसमें कुंडली घूमती है

2- आर्मेचर

यह एक आयताकार कुंडली है जो नरम लोहे के रोड पर पृथक के तांबे के तार लपेट कर बनाई जाती है इस कुंडली में लपेट ओं की संख्या बहुत अधिक होती है आर्मेचर को बेल्ट और पुली की सहायता से किसी यांत्रिक साधन द्वारा चुंबक के ध्रुव ns के बीच तेजी से घुमाया जाता है।

विभक्त वलय

कुंडली के दोनों शीरे विभक्त वलय p औरq से जुड़े रहते हैं, विभक्त वलय पीतल का एक बेलन होता है जिसको लंबाई ने काट कर दो भाग p और q मैं विभाजित कर देते हैं यह दूरी से और आपस में एक दूसरे से पृथक के रहते हैं तथा आर्मेचर के साथ-साथ घूमते हैं।

कार्बन ब्रूश

विभक्त वलय ग्रेफाइट के बने दो ब्रूसो b तथा b1 से स्पर्श किए रहते हैं इन्हीं बूशो के द्वारा बह॔या परिपथ में धारा बहती है ।

कार्य विधि

जब बैटरी से आर्मेचर में धारा प्रवाहित करते हैं तो फ्लेमिंग कि बायें हाथ का नियम से आर्मेचर की भुजा एबी पर एक बाल नीचे की ओर तथा सीडी पर एक लंबा ऊपर की ओर कार्य करने लगता है ये दोनों समानांतर विपरीत तथा बराबर बल एक बल युग्म बनाते हैं जिससे आर्मी च 12 वाट दिशा में घूमने लगता है आर्मी च के साथ भक्त संबंधित हो जाता है जिससे कुंडली कुंडली में प्रवेश करने वाली धारा की दिशा बदल जाती है और आदमी चार उसी दिशा में घूमता है बैटरी का धन ध्रुव संदीप भाई ओर से आर्मी च से जुड़ा रहता है इस प्रकार प्रतिक्षा सीध चक्कर में आर्मी च में प्रवेश करने वाली धारा की दिशा परिवर्तित होती रहती है जबकि आर्मी च उसी दिशा में चक्कर लगाता है चलता रहता है।

विद्युत चुंबकीय प्रेरण

जब किसी परिपथ से होकर गुजरने वाली चुंबकीय बल मैं परिवर्तन होता है तब परिपथ में प्रेरित विभवांतर उत्पन्न हो जाता है तथा बंद परिपथ में प्रेरित धारा बहने लगता है यह घटना विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहलाती है।

दृष्टि धारा

वे धारा जिनका मान और दिशा समय के साथ नहीं बदलता उसे दृष्ट धारा कहते हैं।

प्रत्यावर्ती धारा

वे धारा जिसका परिणाम व दिशा समय के साथ बदलता है उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।

प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति

प्रत्यावर्ती धारा एक सेकंड में जितना चक्कर पूरा करती है उसे आवृत्ति कहते हैं।

डायनेमो या विद्युत जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलता है

यह दो प्रकार का होता है।

1- प्रत्यावर्ती धारा जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा द्वारा प्रत्यावर्ती धारा प्राप्त की जाती है।

2-दृष्टि धारा जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा द्वारा दृष्टि धारा प्राप्त की जाती है।

ओम का नियम तथा वैद्युत क्षेत्र एवं समांतर क्रम, श्रेणी क्रम और वैद्युत आवेश ,धारा

वैद्युत आवेश

महान वैज्ञानिक ने देखा कि अम्बर नामक पदार्थ ऊन से रगड़ा जाता है तो उसमें हल्की वस्तुओं को जैसे कागज के टुकड़े ,तिनके इत्यादि को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण आ जाता है।

  • लगभग 2000 वर्ष तक इस बात को कोई महत्व नहीं दिया गया लेकिन बाद में गिलबर्ट ने प्रयोग द्वारा पता लगाया कि ऐसी बहुत सी वस्तुएं हैं जिन को आपस में रगड़ने पर उनके अंदर हल्की वस्तु को आकर्षित करने का गुण आ जाता है क्योंकि इन पदार्थों में इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान होता है
  • पदार्थ का गुण जिसके कारण विद्युत एवं चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करता है इनका या अनुभव करता है
  • सामान्य अवस्था में प्रत्येक परमाणु में इलेक्ट्रॉन की संख्या उसमें नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन की संख्या की बराबर होती है इसलिए परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है
  • आवेश सदैव द्रव्यमान से बड़े होते हैं
  • परमाणु की विद्युत उदासीनता को समाप्त करके आवेशित कणों को उत्पन्न किया जा सकता है

आवेश तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या में सबंध

q = ne जहाँ q = वैद्युत आवेश

n = इलेक्ट्रॉन की संख्या

e = इलेक्ट्रॉन का आवेश

विद्युत धारा

  • इसे i से प्रदर्शित करते हैं
  • आवेश प्रवाह की दर को वैद्युत धारा कहते हैं अर्थात i = q/t चुकि I = ne/t

विद्युत परिपथ

किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं यदि परिपथ कहीं से टूट जाए तो विद्युत धारा का प्रवाह समाप्त हो जाता है तथा बल दीप्ति नहीं करता है या विद्युत धारा के पद को विद्युत परिपथ कहते हैं

विद्युत परिपथ आरेख

परिपथ के विभिन्न अवयवों को सुविधाजनक प्रतिको द्वारा निरूपित किया जाता है जिसे विद्युत परिपथ आरेख कहते हैं

विद्युत धारा की दिशा

विद्युत धारा की दिशा धन आवेश की गति के दिशा में तथा आवेश की गति की दिशा में के विपरीत मानी जाती है

आवेश की गति की दिशा +

धारा की दिशा➡️

आवेश की गति की दिशा _

⬅️धारा की दिशा

विद्युत धारा का मात्रक

विद्युत धारा का मात्रक मैरी- एम्पियर के सम्मान में एम्पियर रखा गया है

विद्युत धारा का मापन

विद्युत धारा का मापन एंपियर द्वारा करते हैं एंपियर को परिपथ में सदैव श्रेणी क्रम में लगाना चाहिए

विद्युत चालक

वह पदार्थ जिसमें विद्युत धारा प्रवाहित होती है विद्युत चालक कहलाते हैं।

पृथ्वी, धातु, अम्ल, क्षार, लवण

धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनो का सागर होने के कारण यह विद्युत चालक होता है

विद्युत का चालक या विद्युत रोधी

ऐसे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होता विद्युत अचालक कहलाते हैं

जैसे रबड़, प्लास्टिक, सूखी लकड़ी इत्यादि।

अर्धचालक

ऐसे पदार्थ जो कुछ परिस्थितियों में चालक की तरह तो कुछ परिस्थितियों में अचालक की तरह व्यवहार करता है तो ऐसे पदार्थ को अर्धचालक कहते हैं।

जैसे सिलिकॉन तथा जर्मीनियम

विद्युत विभव

एकांक धन आवेश को अनंत से वैद्युत क्षेत्र के किसी बिंदु तक लाने में किया गया कार्य उस बिंदु पर वैद्युत विभव कहलाता है अथातो

जहां w किया गया कार्य है, v = w/q, q = प्रवाहित आवेश , v = विद्युत विभव

इसका मात्रक जूल / कूलाम या बोल्ट होता है।

विभवांतर

वैद्युत क्षेत्र में दो बिंदुओं के बीच एकांक आवेश को ले जाने में किया गया कार्य उन बिंदुओं के बीच का विभवांतर कहलाता है

वोल्ट की परिभाषा

यदि किसी चालक के दो बिंदुओं के बीच एक कूलाम आवेश को स्थानांतरित करने में एक जूल कार्य करना पड़ता है तो उन बिंदुओं के बीच का विभवांतर 1 वोल्ट कहलाता है

विभवांतर का मापन

विभवांतर को वोल्ट मीटर से मापा जाता है

इसको परिपथ के समांतर क्रम में जोड़ते हैं

ओम का नियम

इस नियम के अनुसार किसी चालक के भौतिक अवस्था मैं कोई परिवर्तन नहीं होता है चालक के हीरो के बीच लगा विभक चालक में बहने वाली वैद्युत धारा के समानुपाती होता है।

V∝ i

v = iR , iR = v , R = v/i

भौतिक अवस्था में कोई परिवर्तन ना हो तो चालक के सिरों के बीच लगा विभवांतर वैद्युत चालक में बहने वाली धारा का अनुपात एक नियतांक होता है यही ओम का नियम है

वैद्युत प्रतिरोध

चालक जिस गुण से वैद्युत धारा का विरोध करता है उसे वैद्युत प्रतिरोध कहते हैं

विद्युत प्रतिरोध का मात्रक बोल्ट प्रति एंपियर या होता है

वैघुत प्रतिरोध को R से प्रदर्शित करते हैं

प्रतिरोध का संयोजन

श्रेणी क्रम

श्रेणी क्रम संयोजन में प्रतिरोधों को इस प्रकार जोड़ा जाता है की प्रत्येक प्रतिरोधों का दूसरा सिरा अगले प्रतिरोध की पहले सिरे से जुड़ता है श्रेणी क्रम में सभी प्रतिरोधों में एक ही वह वैघुत धारा बहती है परंतु उनके सिरों के बीच विभवांतर उनके प्रतिरोधों के अनुसार अलग-अलग होते हैं

माना प्रतिरोध R1 ,R2 ,R3 परस्पर श्रेणी क्रम में समायोजित है तथा इन प्रतिरोध में धारा प्रवाहित हो रही है यदि प्रतिरोधों के सिरों के विभवांतर v1 ,v2 ,v3 हो तो

ओम के नियम से – V= iR

v1 = iR1

v1 = iR2

v3 = iR3

यदि A और B के बीच विभवांतर v है तो

V= v1 +v2 + v3

v = iR1 + iR2 + iR3

यदि A और B के बीच तुल्य प्रतिरोध R हो

v = iR

समीकरण 1 और 2 को तुलना करने पर

v= iR1 + iR2 +iR3

R = R1 + R2 + R3

श्रेणी क्रम में जुड़े प्रतिरोधों का तुल्य प्रतिरोध उन प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है

समांतर क्रम

जब दो या दो से अधिक प्रतिरोध इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि उन सभी के पहला शीला एक बिंदु से तथा दूसरा सिरा अन्य बिंदुओं से जुड़ा हो तो इस संयोग को समांतर क्रम कहते हैं

इस संयोग के सभी प्रतिरोधों के बीच एक ही विभवांतर लगता है परंतु उसमें धारा भिन्न-भिन्न होती है

माना प्रतिरोध R1 R2 R3 क्रमशः i1 i2 i3 धाराये बहती हैं बिंदु पर यह तीनों धाराएं मिल जाती हैं और मुख्यधारा i बन जाती है

ओम के नियम से –

v = i1 R1

i1 = v / R1

v = i1 R2

i2 = v / R2

v = i3 R3

i3 = v/ R3

I = i1 +i2 +i3

I = v/R1 + v/R2 + v/R3

समांतर क्रम में जुड़े प्रतिरोध की तुल्य प्रतिरोध का व्युत्पन्न उन प्रतिरोधों के व्युत्पन्नो के योग के बराबर होता है

Note – श्रेणी क्रम में जुड़े प्रत्येक प्रतिरोध में वैद्युत धारा समान बहती है लेकिन इन प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवांतर भिन्न-भिन्न होता है

समांतर क्रम में जुड़े प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवांतर समान होता है लेकिन इनमें बहने वाली धारा भिन्न-भिन्न होती है

ओमिया चालक

जो चालक ओम के नियम का पालन करता है उसे ओमिया चालक कहते हैं

अनओमिया चालक

जो चालक ओम के नियम का पालन नहीं करते उसे अनओमीय चालक कहते हैं हां और जो ओम के नियम का पालन नहीं करता वह लैंग म्यूर के नियम का पालन करता है

जैसे – डायोड बल्ब, टायोड बल्ब

समविभव पृष्ठ

वैद्युत क्षेत्र में खींचा गया ऐसा पृष्ठ जिस पर स्थित बिंदुओं पर वैद्युत विभव सामान हो समविभव पृष्ठ कहलाता है।

वैद्युत 1- संयोजकता किसे कहते हैं?

3- धातु और अधातु की परिभाषा

4- आवर्त सारणी का विकास,वर्गीकरण एवं वर्गीकरण का इतिहास और मेण्डलीफ की आवर्त सारणी , गुण एवं दोष।

5- सहसंयोजक बंध किसे कहते हैं?

आवर्त सारणी का विकास,वर्गीकरण एवं वर्गीकरण का इतिहास और मेण्डलीफ की आवर्त सारणी , गुण एवं दोष।

आवर्त सारणी की आवश्यकता

प्रारम्भ में तत्वों की संख्या बहुत कम था लेकिन जैसे-जैसे तत्वों की संख्या बढ़ती गई वैसे- वैसे इनका अध्ययन करने में कठिनाइयां होने लगी इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए आवर्त सारणी की आवश्यकता पङी ।

आवर्त सारणी का विकास

प्रारम्भ में आवर्त सारणी में धातु और अधातु के लिए स्थान प्राप्त था लेकिन धीरे-धीरे जब गैस, अक्रिय गैस, उपधातु को आवर्त सारणी में स्थान देते हुए आवर्त सारणी का विकास किया गया ।

आवर्त वर्गीकरण

किसी मैलिक गुण को आधार बनाकर की गई पदार्थों की ऐसी व्यवस्था जिसमें निश्चित अन्तराल के बाद समान गुण वाले पदार्थों पुनः उपस्थित हो आवर्तो व्यवस्था या आवर्तो वर्गीकरण कहलाती हैं ।

तत्वों के वर्गीकरण का इतिहास

19 वी शताब्दी में तत्वों के वर्गीकरण को कई प्रयास किये गये जिसमें प्राउट की परिकल्पना, डोबरनियर का त्रिक नियम, डुमा की सममुलक श्रेणी, न्यूलैण्ड का अस्टक नियम, लोथर मेयर का परमाणु आयतन तथा परमाणु भार वक्र, मेण्डलिफ का आवर्त नियम आदि प्रमुख है ।

डोबर नियर का त्रिक नियम

डोबर नियर ने तीन-तीन तत्व का ऐसा समुह बनाया जिसके गुण परस्पर समान थे और बीच वाले तत्व का परमाणु भार किनारे वाले तत्व के परमाणु भार के औसत योग के बराबर था ।

example 👉 (1) – Li (7) , Na = 7+39/2
Na (?) = 46/2
K (39) = 23

मेण्डलीफ की आवर्त सारणी

  • सबसे पहली आवर्त सारणी मेण्डलीफ ने दिया था ।
  • जब मेण्डलीफ ने आवर्त सारणी बनाया तब 63 तत्व मौजूद थे ।
  • मेण्डलीफ ने बताया कि तत्वों की पहचान उनके परमाणु भार से की जाती हैं ।
  • जब मेण्डलीफ ने बताया कि तत्व की पहचान परमाणु भार से करते है तो यह प्रश्न उठने लगा कि उन तत्वों की पहचान कैसे की जायेगी जिनके परमाणु भार 1 से अधिक होंगे अतः समस्थानिक का गुण मेण्डलीफ की आवर्त सारणी को गलत साबित किया ।

example 👉 (1) – 1H1 ,1H2 ,1H3 (2) – 6C12,6C13,6C14 (3)- 2He3 , 2He4

  • व्युत्क्रमीत जोड़े ने भी मेण्डलीफ की आवर्त सारणी को असफल कर दिया ।
  • व्युत्क्रमीत जोड़े का मतलब यह होता है कम वाले परमाणु क्रमांक का परमाणु भार अधिक होता है और अधिक वाले परमाणु क्रमांक का परमाणु भार कम होता है ।

example 👉 (1) – 27CO59 , 28Ni58 (2)- 90Th232 , 91Pa231

  • मेंडलीफ ने अपने आवर्त सारणी में कुछ स्थान छोड़ दिया था क्योकि उनका मानना था की आगे भी तत्व की खोज होगी।
  • गैलियम की खोज ने मेंडलीफ आवर्त सारणी की सत्यता को सिद्ध किया।

मेंडलीफ के आवर्त सारणी के गुण

  • तत्वों के अध्ययन में सुविधा
  • नये तत्वों की भविष्यवाणी
  • तत्वों के यैगिक की प्रकृति की जानकारी
  • तत्वों की संयोजकता की जानकारी

मेंडलीफ के आवर्त सारणी के दोष

  • आवर्त सारणी में हाइड्रोजन का स्थान न होना
  • आवर्त सारणी में समस्थानिक के लिए कोई स्थान न होना।
  • आवर्त सरणी में धातु एवं अधातु के बिच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा न होना।

मोजले का प्रयोग

मोजले ने प्रयोग द्वारा यह निष्कर्ष निकलता की x – किरणे की आवृति तथा उसके परमाणु क्रमांक में निम्न सम्बन्ध है।

√v = a(z-b)

जहां v = x – किरणो की आवृत्ति , z = परमाणु क्रमांक , a,b = मोजले नियतांक

  • तत्वों की आवृत्ति (v) और परमाणु क्रमांक (z) में ग्राफ खींचने पर एक सीधी रेखा प्राप्त होती है किन्तु आवृत्ति (v) और परमाणु भार के बिच ग्राफ खिचने पर सीधी रेखा प्राप्त नहीं होती है।
  • मोजले के प्रगोग से शिध्द हुआ की परमाणु क्रमांक तत्व का मूल लक्षण है। न की परमाणु भार।

note – मेण्डलीफ ने स्कैनडियम ,गैलियम आदि के गुण उनकी खोज से पहले बता दिए थे।

जब मेंडलीफ ने अपनी आवर्त सारणी बनायीं थी तब अक्रिय गैसे का खोज नहीं हुआ था

आधुनिक आवर्त नियम

  • मोजले के प्रयोग से सिद्ध होता है की परमाणु क्रमांक तत्व का मुख्य लक्षण है परमाणु भार नहीं।
  • इस नियम के अनुसार तत्वों का गुण उनके परमाणु क्रमांक के आवृत्ति फलन होते है
  • आधुनिक आवर्त नियम से समस्थानिक तथा व्युत्क्रमित जोड़े की समस्या दूर हो गई।
आवर्त श्रेणी तत्वों की संख्या परमाणु क्रमांक
1 I 2 1- 2
2 I 8 3- 10
3 III 8 11 – 18
4 III/II 18 19 – 36
5 VI/VII 18 37 -54
6 VIII/IX 32 55- 86
7 X 28 87 – 114

परमाणु त्रिज्या

किसी सह संयोजक अणु के दो परमाणु नाभिक के बिच की दुरी का आधा भाग परमाणु त्रिज्या कहलाता है।

  • किसी एक ही वर्ग में ऊपर से निचे जाने पर परमाणु त्रिज्या घटती है क्युकी कोश की संख्या बढ़ती है। ,R ∝n2
  • किसी एक ही आवर्त में बाये से दाये जाने पर परमाणु त्रिज्या से छोटी होती है।क्युकी परमाणु क्रमांक बढ़ता है। ,R ∝1/Z

धनात्मक की त्रिज्या

किसी परमाणु के धनायान की त्रिज्या उसके उदासीन परमाणु त्रिज्या से छोटी है।
example – Na >Na+

ऋणायन की त्रिज्या

किसी ऋणायन के त्रिज्या उसके परमाणु त्रिज्या से सदैव बड़ी होती है।
example – Cl < Cl-

वांडरवाल त्रिज्या

किसी दो समीपवर्ती अणुओ के परमाणु के नाभिक बिच के दुरी का आधा भाग वान्डरवाल त्रिज्या कहलाता है।

note – सामान्य रूप से आवर्त में बाए से दाये जाने पर हैलोजन वर्ग तक परमाणु त्रिज्या घटती है लेकिन नोबेल गैस की परमाणु त्रिज्या सबसे अधिक होती है।

विघुत ऋणात्मकता

किसी यैगिक में एक परमाणु द्वारा दूसरे परमाणु के इलेक्ट्रान को खींचने की क्षमता उस परमाणु का विघुत ऋणात्मकता कहलाता है।

  • इसके बारे में एक पालिंग ने किया था।
  • अक्रिय गैसों की विघुत ऋणात्मकता शून्य होती है।
  • किसी आवर्त में बाये से दाये जाने पर वर्ग 7 तक विघुत ऋणात्मकता बढ़ता है क्युकी परमाणु त्रिज्या घटती है।
  • किसी एक ही वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर विघुत ऋणात्मकता घटता है क्योकि परमाणु त्रिज्या बढती है ।

आयनन विभव या आयनन ऊर्जा

किसी तत्व के एक परमाणु में से एक इलेक्ट्रॉन को निकालने में जितने ऊर्जा की आवश्यकता होती है उसे आयनन विभव कहते हैं।

  • आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर आयनन विभव बढ़ता है
  • किसी एक ही वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर आयनन विभव घटता है।
  • हाइड्रोजन का प्रथम आयनन विभव +13.6ev होता है।
  • प्रथम आयनन विभव < द्वितीय आयनन विभव< तृतीय आयनन विभव

E = -13.6ev/n2

विकर्ण संबंध

आवर्त दो के पहले तीन तत्व आवर्त तीन के उन तत्वों से गुणों में समानता प्रदर्शित करते हैं जो उनके विकर्ण सम्मुख है एक वर्ग आगे हैं

आवर्त दो

आवर्त 3

तत्वों के ऑक्साइड की प्रकृति

तत्वों के ऑक्सीजन के संयोग से बने यौगिक आक्साइड कहलाते हैं ।

अयस्क क्या है? इसकी परिभाषा, प्रकार एवं गालक की परिभाषा

अयस्क क्या है?

वे खनिज जिससे शुद्ध धातु आसानी से प्राप्त किया जा सके अधिक मात्रा में उसे अयस्क कहते हैं।

अयस्क के प्रकार

अयस्कों के मूल रासायनिक प्रकार निम्नलिखित है-

1- ऑक्साइड

जैसे – बाक्साइड ( Al2O3 .2H20), मैग्नेटाइट (Fe3O4) क्यूप्राइट(Cu2O) आदि

2- कार्बोनेट

जैसे – सीडेराइट(FeCO3), लाइमस्टोन (CaCO3), मैग्नेसाइट (MgCO)

3-सल्फाइड

जैसे – आयरन पापराइट (FeSO2), सिल्वर ग्लांस (Ag2S),गैलना( Pbs)

4-हैइलाइट

जैसे- हान् सिल्वर( AgCl), कानेरलाइट( KCl.MgCl.6H2O), कायोलाइट (Na3AlF6)

आघात्री या मैट्रिक्स

अयस्क में मिट्टी के कण बालू, पत्थर छोटे-छोटे टुकड़े आदि अशुद्धियों के रूप में मिला होता है, जिसे आघात्री या मैट्रिक्स कहते हैं।

  • अयस्क, कार्बन और चूना पत्थर के मिश्रण को घान कहते हैं।

गालक तथा धातुमल

वे रासायनिक पदार्थ जो अयस्क में उपस्थित अलगनी अशुद्धियों से क्रिया करके उन्हें गलनी पदार्थ में बदल देते हैं। उन्हें गालक कहते हैं, तथा गलनी पदार्थ धातु मल कहलाता है।

गालक के प्रकार

गालक दो प्रकार के होते हैं।

अम्लीय गालक

जो गालत क्षारीय अशुद्धियों को दूर करने के लिए प्रयोग किया जाता है। अम्लीय गालक कहलाता है।

जैसे- FeO + SiO2 ➡️ FeSiO3

क्षारीय गालक

वह गालत जो अम्लीय अशुद्धियों को दूर करने के लिए किया जाता है , क्षारीय गालक कहलाता है।

जैसे- CaCO3 + SiO2 ➡️ CaSiO3 + CO2

धातु कर्म

धातुओ को उनके अयस्क से शुद्ध रूप से प्राप्त करने की क्रिया को धातु कर्म कहते हैं।

धातु कर्म में निम्नलिखित पद प्रयोग होते हैं

अयस्क का पीसना

अयस्क के बड़े टुकड़ों को हथौड़े से पीटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है।

अयस्क का सांद्रण

अयस्क से अशुद्धियां दूर करने की प्रक्रिया आयुक्त अयस्क का सांद्रण या प्रसाधन कहलाता है।

धातु किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा, प्रकार, गुण और सभी धातुओं की लिस्ट PDF में

तत्वों को उनके गुणों के आधार पर निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया गया है।

धातु किसे कहते हैं?

धातु (metal) वे होते हैं, जो इलेक्ट्रॉन (e-) का त्याग करते है, और धनायन (positive charge) बनाते है। या वे परमाणु जिनमे इलेक्ट्रान त्यागने की प्रवित्ति हो धातु कहलाते है। धातुओं के परमाणु में धन आवेश (positive charge) होता है।

जैसे- ca,mg ,Na, Hg,Pb

धातु की परिभाषा

आवर्त सारणी के वे तत्व जिनके परमाणुओं में इलेक्ट्रान त्यागने का गुण हो जो स्वंय को धनावेशित प्रदर्शित करते हो।

धातु के प्रकार

आवर्त सारणी में धातु के प्रकार कितने है, सभी की लिस्ट है।

क्रमांकपरमाणु संख्याप्रतीक धातुओं के नाम
13Liलिथियम (Lithium)
24Beबेरिलियम (Beryllium)
311Naसोडियम (Sodium)
412Mgमैग्नीशियम (Magnesium)
513Alएल्युमीनियम (Aluminium)
619Kपोटैशियम (Potassium)
720Caकैल्शियम (Calcium)
821Scस्कैंडियम (Scandium)
922Tiटाइटेनियम (Titanium)
1023Vवनैडियम (Vanadium)
1124Crक्रोमियम (Chromium)
1225Mnमैंगनीज (Manganese)
1326Feआयरन (Iron)
1427Coकोबाल्ट (Cobalt)
1528Niनिकल (Nickel)
1629Cuकॉपर (Copper)
1730Znजिंक (Zinc)
1831Gaगैलियम (Gallium)
1937Rbरूबिडीयाम (Rubidium)
2038Srस्ट्रोंटियम (Strontium)
2139Yयत्त्रियम (Yttrium)
2240Zrज़िरकोनियम (Zirconium)
2341Nbनाइओबियम (Niobium)
2442Moमॉलीबेड़ीनुम (Molybdenum)
2543Tcटेक्नेटियम (Technetium)
2644Ruरुथेनियम (Ruthenium)
2745Rhरोडियाम (Rhodium)
2846Pdपैलेडियम (Palladium)
2947Agसिल्वर (Silver)
3048Cdकैडमियम (Cadmium)
3149Inइंडियम (Indium)
3250Snटिन (Tin)
3355Csसीज़ियम (Cesium)
3456Baबेरियम (Barium)
3557Laलेण्टेनियुम (Lanthanum)
3658Ceसैरियम (Cerium)
3759Prप्रेसियोडीमियम (Praseodymium)
3860Ndनीयोडिमियम (Neodymium)
3961Pmप्रोमीथियम (Promethium)
4062Smसमैरियम (Samarium)
4163Euयुरोपियम (Europium)
4264Gdगैडोलीनियम (Gadolinium)
4365Tbटर्बियम (Terbium)
4466Dyडिस्पोसियम (Dysprosium)
4567Hoहॉल्मियम (Holmium)
4668Erअर्बियम (Erbium)
4769Tmथूलियम (Thulium)
4870Ybअटर्बियम (Ytterbium)
4971Luलुटेटियम (Lutetium)
5072Hfहेफ़नियम (Hafnium)
5173Taटैंटलम (Tantalum)
5274Wटंगस्टन (Tungsten)
5375Reरेनीयाम (Rhenium)
5476Osऑस्मियम (Osmium)
5577Irइरीडियम (Iridium)
5678Ptप्लैटिनम (Platinum)
5779Auगोल्ड (Gold)
5880Hgमर्क्युरी (Mercury)
5981Tlथैलियम (Thallium)
6082Pbलीड (Lead)
6183Biबिस्मुथ (Bismuth)
6284Poपॉलोनियम (Polonium)
6387Frफ्रैनशियम (Francium)
6488Raरेडियम (Radium)
6589Acएक्टीनियम (Actinium)
6690Thथोरियम (Thorium)
6791Paप्रोटैक्टीनियम (Protactinium)
6892Uयूरेनियम (Uranium)
6993Npनैप्टुनियम (Neptunium)
7094Puप्लूटोनियम (Plutonium)
7195Amअमेरिसियम (Americium)
7296Cmक्यूरियम (Curium)
7397Bkबेरकेलियम (Berkelium)
7498Cfकैलिफोर्नियम (Californium)
7599Esआइंस्टिनियम (Einsteinium)
76100Fmफेर्मियम (Fermium)
77101Mdमेंडेलेवियम (Mendelevium)
78102Noनोबेलियम (Nobelium)
79103Lrलॉरेंशियम (Lawrencium)
80104Rfरथर्फॉर्डियम (Rutherfordium)
81105Dbडुबनियम (Dubnium)
82106Sgसेअबॉर्जियं (Seaborgium)
83107Bhबोहरीओम (Bohrium)
84108Hsहैशियम (Hassium)
85109Mtमिटनेरियम (Meitnerium)
86110Dsडार्मस्टडियम (Darmstadtium)
87111Rgरोएंटगेनियम (Roentgenium)
88112Cnकोपर्निशियम (Copernicium)
89113Nhनिहोनियम (Nihonium)
90114Flफ्लेरोवियम (Flerovium)
91115Mcमॉस्कोवियम (Moscovium)
92116Lvलिवेरमोरियम (Livermorium)
धातुओं की लिस्ट

धातुओं के प्रकार PDF में

धातु के गुण

धातुओं में एक विशेष चमक पाया जाता है, जिसे धात्विक चमक कहते हैं।

  • धातु अपारदर्शी होते हैं।
  • साधारण ताप पर सभी धातुएं ठोस होते हैं, लेकिन पारा (Hg) द्रव होता है।
  • सभी धातुएं विद्युत या ऊष्मा सुचालक होते हैं, लेकिन लेड (Pb) नहीं होता है।
  • धातु तन्य होते हैं, जिसको तार के रूप में खींचकर बढ़ाया जा सकता है।
  • सोना और चांदी सबसे अधिक आघात वर्धय होते हैं।
  • सोडियम तथा पोटेशियम को छोड़कर सभी धातुओं की गलनाक तथा क्वथनांक बहुत ऊंचा होता है।
  • सोडियम पोटैशियम आदि को छोड़कर धातुओं का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होता है।

धातुओं के उपयोग

  • मशीनों के पुर्जे ,बिजली के तार तथा अन्य बिजली के उपकरण के निर्माण में।
  • सिक्के बनाने में भी धातुओं का प्रयोग किया जाता है।
  • विद्युत लेपन में।
  • मुद्राएं मनाने में ।

धातुओं का संक्षारण

वायु या रासायनिक पदार्थों द्वारा धातुओं का धीरे धीरे जंग होना धातुओं का संक्षारण कहलाता है।

जैसे – लोहे पर जंग लगना

  • धातुओं का संक्षारण रोकने के लिए धातुओं के पृष्ठ पर पेंट किया जाता है। किसी धातु पर दूसरे धातु का परत चढ़ाते हैं, जिसे धातु का लेपन कहते हैं। जैसे – लोहे के चादरों पर टीन का लेपन कर लेने से लोहे की चादरों का संक्षारण नहीं होता है
  • कभी-कभी धातु का संक्षारण लाभदायक भी होता है। जैसे- एलमुनियम धातु को वायु में खुला छोड़ देने पर उसकी सतह पर एलमुनियम तथा वायु की ऑक्सीजन की अभिक्रिया से बने एल्युमीना (Al2O3) की परत चढ जाती है जो इसके आगे होने वाले संक्षारण को रोकने में सुरक्षा कवच का कार्य करती है।

आवर्त सारणी में कितने धातु है?

अभी तक 116 धात्विक तत्वा सामिल है।

वह कौन सी धातु है, जो द्रव अवस्था में रहती है?

पारा (Hg) एक ऐसी धातु है, जो सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में रहता है।

वह कौन सा वह कौन सा धातु है जो विद्युत का कुचालक है?

लेड (Pb) एक ऐसी धातु है। जो विद्युत का कुचालक है।

कम क्रियाशील धातु कौन सी है?

कम क्रियाशील वाले धातु सोना, चांदी, प्लेटिनम और कॉपर है।

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