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गोलीय दर्पण की परिभाषा || गोलीय दर्पण के प्रकार || गोलीय दर्पण का सूत्र || गोलीय दर्पण का ध्रुव

गोलीय दर्पण की परिभाषा || गोलीय दर्पण का सूत्र
 ||  गोलीय दर्पण के प्रकार || गोलीय दर्पण का ध्रुव

गोलीय दर्पण की परिभाषा

गोलीय दर्पण का दूसरा तल चमकदार होता है|
गोलीय दर्पण किसी कांच के खोखले गोले के कटे हुए विभाग होते हैं| जिनके एक डाल पर चांदी तथा पारे की पालिश करके उसके ऊपर लाल रंग का लोहा ऑक्साइड का पेंट कर दिया जाता है| इससे इन का दूसरा तल चमकदार हो जाता है| चमकदार तल से प्रकाश का परावर्तन होता है|

गोलीय दर्पण के प्रकार

गोलीय दर्पण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं|
  1. अवतल गोलीय दर्पण
  2. उत्तल गोलीय दर्पण

अवतल गोलीय दर्पण

इस दर्पण में उत्तल पृष्ठ पर चांदी का पालिश की जाती है| तथा प्रकाश का परावर्तन अंदर की ओर दबी सत्र से होता है| जैसा कि निम्न चित्र से प्रदर्शित है| गोलीय दर्पण के प्रकार

 

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उत्तल गोलीय दर्पण

इस दर्पण में उत्तल पृष्ठ पर चांदी की पॉलिश की जाती है| तथा प्रकाश का परावर्तन उभरी सतह से होता है| जैसा कि निम्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है गोलीय दर्पण के प्रकार
गोलीय दर्पण की परिभाषा || गोलीय दर्पण के प्रकार ||  गोलीय दर्पण का सूत्र || गोलीय दर्पण का ध्रुव
गोलीय दर्पण से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण पद
 

 

  • गोलीय दर्पण का ध्रुव

गोलीय दर्पण के परावर्तक तल के मध्य बिंदु को दर्पण का ध्रुव कहते हैं| इसे चित्र में बिंदु p से दर्शाया गया है| गोलीय दर्पण की परिभाषा

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  • गोलीय दर्पण का केंद्र

गोलीय दर्पण जिस खोखले गोले का भाग है, उसके केंद्र को दर्पण का वक्रता केंद्र कहा जाता है| जैसा कि उपरोक्त चित्र में दर्शाया गया है|

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  • गोलीय दर्पण की त्रिज्या

वक्रता केंद्र से दर्पण के ध्रुव तक की दूरी दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहलाती है| दूसरे शब्दों में, गोलीय दर्पण कांच के जिस गोले का भाग होता है, इसकी त्रिज्या दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहलाती है| इसे R से व्यक्त करते हैं|

  • गोलीय दर्पण का मुख्य अक्ष

गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा वक्रता केंद्र को मिलाने वाली सरल रेखा को मुख्य कहा जाता है जैसा कि निम्न चित्र में रेखा PC दर्पण का मुख्य है|

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  • गोलीय दर्पण का मुख्य फोकस या फोकस

किसी गोली दर्पण की मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली आर्थिक किरण दर्पण से परावर्तन के पश्चात मुख्य अक्ष जिस बिंदु से होकर जाती है, वह बिंदु दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है| जैसा कि निम्न चित्र में इसे F से प्रदर्शित किया गया है| तथा केवल फोकस भी कहते हैं| अवतल दर्पण में परावर्तन के पश्चात प्रकाश के किरण फोकस F पर मिलती है| जबकि उत्तल दर्पण में परावर्तन के पश्चात किरण फोकस से आती हुई प्रतीत होती है|

  • गोलीय दर्पण की फोकस दूरी

गोलिये दर्पण के ध्रुव p तथा मुख्य फोकस F के बीच की दूरी फोकस दूरी कहलाती है| इसे F से प्रदर्शित किया जाता है| गोलीय दर्पण का फोकस, उसके ध्रुव तथा वक्रता केंद्र के ठीक मध्य होता है| इसलिए गोलीय दर्पण की फोकस दूरी, वक्रता त्रिज्या की आधी होती है|

गोलीय दर्पण का सूत्र

     गोलीय दर्पण का सूत्र               f = (1/2) R
  • गोलीय दर्पण का अभिलंब

गोलीय दर्पण में दर्पण के किसी बिंदु को वक्रता केंद्र से मिलाने वाली रेखा अभिलंब कहलाती है|

विद्युत धारा की परिभाषा, प्रकार, सूत्र, मात्रक एव उष्मीय, चुंबकीय प्रभाव कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

विद्युत धारा की परिभाषा, प्रकार, सूत्र, मात्रक एव उष्मीय, चुंबकीय प्रभाव कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

विद्युत धारा की परिभाषा-

 

आवेश की गति की अवस्था विद्युत धारा कहलाती है

 

विद्युत धारा की परिभाषा, प्रकार, सूत्र, मात्रक एव उष्मीय, चुंबकीय प्रभाव कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

 

 


 

जिस प्रकार किसी नदी में जल प्रवाहित होता है, ठीक उसी प्रकार किसी चालक में आवेश प्रवाहित होता है|

 

चालक में से प्रवाहित होने वाला आवेश विद्युत धारा बनाता है| दूसरे शब्दों में,  जब किसी चालक में आवेश प्रवाहित होता है तो इस प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं| यदि प्रवाहित होने वाला आवेश धनात्मक होता है|

 

तो धारा की दिशा आवेश के प्रभावित होने की दिशा में ही होगी, परंतु यदि प्रवाहित होने वाला आवेश ऋणत्मक

 

होता है| तो धारा की दिशा आवेश के प्रवाहित होने के विपरीत दिशा में होती है| यदि किसी बंद परिपथ में t  सेकंड
में प्रवाहित आवेश की मात्रा q है  तो परिपथ में विद्युत धारा
i = q / t
अब यदि t = 1 सेकंड हो, तो उपयुक्त सूत्र से

 

अतः विद्युत धारा को इस प्रकार से भी परिभाषित किया जा सकता है

 

“किसी परिपथ में 1 सेकंड में जितना आवेश प्रवाहित होता है उस आवेश को ही उस परिपथ की विद्युत धारा कहते हैं| “

 

विद्युत धारा का सूत्र

 

i = q / t
जहाँ i = धारा, q = आवेश, t = समय

विद्युत धारा का मात्रक

 

विद्युत धारा का मात्रक कुलाम / सेकंड या एंपियर होता है |

 

1 एंपियर = कुलाम/ सेकंड

 

आता 1 एंपियर को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है

यदि किसी चालक में आवेश के प्रवाह की दर एक कूलाम प्रति सेकंड हो तो उस में प्रवाहित धारा एक एंपियर होती है|

 

विद्युत धारा के प्रकार

 


 

परिणाम तथा प्रवाह की दिशा के अनुसार “विद्युत धारा” सामान्यत दो प्रकार की होती है|

 

 

 

 

  • प्रत्यावर्ती विद्युत धारा
  • दिष्ट विद्युत धारा

 

 

प्रत्यावर्ती विद्युत धारा

वह धारा जिसका परिणाम तथा प्रवाह की दिशा समय के साथ परिवर्तनशील होते हैं तथा एक निश्चित
समय T के बाद अपनी पूर्व अवस्था में आ जाते हैं,  प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है|T/2 समय के लिए धारा
का प्रवाह एक दिशा में तथा अगले T/2 समय के लिए धारा का प्रवाहविपरीत दिशा में होता है| धारा
तथा समय के बीच वक्र एक ज्या वक्त होता है|

दिष्ट विद्युत धारा

 

यदि किसी चालक में प्रवाहित आवेश की दर समय के साथ नहीं बदलती है|

 

तो चालक में प्रवाहित धारा स्थाई धारा कहलाती है|  इस स्थाई धारा का परिणाम

 

एवं प्रवाह की दिशा समय के साथ अपरिवर्तित रहती है| यदि धारा जिसका परिणाम
एवं प्रवाह की दिशा नियत बनी रहती है| दिष्ट धारा कहलाती है|  यदि धारा के प्रवाह
की दिशा  नियत तथा परिणाम परिवर्तित हो तो उसे परिवर्तित दिष्ट धारा कहते हैं
 
 

 

 

 

ओम का नियम की परिभाषा | अनुगमन वेग के आधार पर ओम के नियम की व्युत्पत्ति

ओम का नियम की परिभाषा

यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था जैसे ताप में कोई परिवर्तन ना हो तो चालक के सिरे पर लगाए गए विभवांतर तथा उनमें बहने वाली धारा का अनुपात नियत रहता है। ओम का नियम की परिभाषा

ब्याख्या 

कुछ  चालकों पर लगा विभवांतर तथा उनमें प्रवाहित धारा का अनुपात कभी नहीं बदलता है।
जब किसी चालक के सिरों के बीच विभवांतर स्थापित किया जाता है। तो चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। सन 1826 मैं जर्मन वैज्ञानिक जान साइमन ओम ने किसी चालक के सिरों पर लगाए गए विभवांतर तथा उन में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा का संबंध एक नियम के द्वारा व्यक्त किया जिसे ओम का नियम कहते हैं। वैज्ञानिक ओम के अनुसार किसी चालक में जितना विभवांतर स्थापित किया जाता है। उतनी ही धारा प्रवाहित होती है। अर्थात किसी चालक पर लगाया गया विभवांतर तथा चालक में प्रवाहित धारा का अनुपात सदैव नियत रहता है।

ओम का नियम के सूत्र 

माना किसी चालक के सिर पर लगाया गया विभवांतर  V हो तो तथा उस में बहने वाली विद्युत धारा i है। R एक नियतांक है ओम के नियम के अनुसार

V ∝ i 
V = iR

जहाँ V विभवांतर और i विधुत धारा है

ओम का नियम

    इस प्रकार यह कहा जा सकता है। कि जब तक किसी चालक का ताप तथा अन्य भौतिक अवस्थाएं नहीं बदलती, तब तक चालक का प्रतिरोध नियत रहता है। चाहे चालक के सिरों के बीच कितना भी विभवांतर क्यों ना लगाया जा यदि चालक पर लगाए गए विभवांतर वी तथा चालक में प्रवाहित धारा आई के बीच ग्राफ खींचा जाए तो एक सरल रेखा प्राप्त होगी

 

अनुगमन वेग के आधार पर ओम के नियम की व्युत्पत्ति

  चालक में मुक्त इलेक्ट्रान अनुगमन वेग से क्षेत्र की दिशा के विपरीत गति करने लगता है। माना l लंबाई तथा A अनुप्रस्थ काट का कोई चालक है जिसमें मुक्त इलेक्ट्रान घनत्व अर्थात इस के एकांक आयतन में उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n है। इस चालक के सिरों पर V विद्युत विभवांतर स्थापित करने पर चालक में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। जिसके फलस्वरुप चालक में मुक्त इलेक्ट्रान अनुगमन वेग Vd से क्षेत्र की दिशा के विपरीत गति करने लगते हैं। अतः चालक में इसके परिणाम स्वरुप विद्युत धारा i मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति की दिशा के विपरीत प्रवाहित होने लगते हैं। धारा तथा अनुगमन वेग में निम्नलिखित संबंध होता है। i = neAVd तथा चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग तथा शांति काल में निम्नलिखित संबंध होता है। Vd = eVj / ml जहां e = इलेक्ट्रॉन का आवेश M = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान J = इलेक्ट्रॉन का क्रांतिकारी समीकरण 2 से Vd  का मान समीकरण 1 में रखने पर I = neA (eVj / ml) = ( neAj / ml ) V V / i = ml / ne2 Aj समीकरण 3 के दाएं पक्ष की राशि में चालक विशेष के लिए l, A, n  नियत तथा m व e स्वयं नियतांक है। और यदि चालक का तापमान स्थिर रहे तो j  भी नियत रहेगा। अतः निश्चित आप पर अर्थात यदि चालक की भौतिक अवस्थाएं नियत है तो तो शमी करती के दाएं पक्ष की राशि ( ml/ne2Aj) एक नियतांक होगी यही चालक का विद्युत प्रतिरोध R  होगा । R = ml / ne2 Aj V /i =R

डीसी मोटर बनाने की विधि घर पर आसानी से कम खर्च पर विज्ञानं प्रोजेक्ट के किये बनाये

 

नमस्कार दोस्तों आपको इस आर्टिकल में डीसी मोटर बनाने की विधि के विषय में संपूर्ण जानकारी दी गई है इन विधि  का अनुसरण करके आप डीसी मोटर अपने घर पर बना सकते हैं
डीसी मोटर बनाने की विधि

डीसी मोटर बनाने की विधि के लिए आवश्यक सामग्री

 
  • कॉपर का तार
  •  चुंबक
  •  लकड़ी
  •  बैटरी
  •  तार
  • बालू पेपर
  •  कटर
  •  हुक

 

डीसी मोटर बनाने की विधि का स्टेप 2 कॉपर Coil का निर्माण

डीसी मोटर बनाने की विधि का स्टेप 2 कॉपर Coil का निर्माण
 
 
  1. वायर कटर की सहायता से कॉपर के तार को तीन से चार फीट तक काट ले
  2. अब आप कॉपर के तार को शुष्क सेल पर लपेटना शुरू करें यदि शुष्क सेल उपलब्ध ना हो तो उसके स्थान पर किसी ऐसी बेलनाकार वस्तु का प्रयोग करें कॉपर Coil लपेटते समय शुरू और अंत में 2 से 3 इंच छोड़ना ना भूलें 
    मेटल रोड
  3. कॉपर के तार को शुष्क सेल पर अच्छी तरह लपेटे हमें उम्मीद है कि आप यह कार्य अच्छी तरह कर लेंगे
  4. तार को कम से कम 15 से 20 बार लपेटे शुरू, अंत में 2 से 3 इंच छोड़ दे
  5. तार लपेटने के पश्चात उसे बाहर निकालें आप देखेंगे कि एक स्प्रिंग जैसी संरचना अब बचे हुए तार से दो जगहों पर बांध दें
  6. कॉपर के तार पर विद्युत कुचालक का लेप लगा होता है क्वायल के दोनों सिरों को बालू पेपर की सहायता से रगड़ कर कुचालक लेप को हटा दें जिससे क्वायल में विद्युत का संचार हो सके

डीसी मोटर बनाने की विधि स्टेप 3 ढ़ाचा तैयार करना

  1. 8 से 9 इंच लकड़ी का लॉक ले
  2. इस पर 4 इंच दो लकड़ी के स्तंभ खड़ा करें
  3. लकड़ी के स्तंभ को खड़ा करने के पश्चात उनके ऊपरी सिरों पर L आकार की पिन लगा दे
    यह पिन धातु की बनी होनी चाहिए क्योंकि धातु विद्युत के सुचालक होते हैं
  4. बने हुए कॉपर Coil को पिन के सहारे अटका दें ध्यान रहे की कॉपर Coil का वह हिस्सा पिन के संपर्क में होना चाहिए जिस हिस्से का कुचालक पदार्थ बालू पेपर सहायता से हटाया गया था ताकि जब पिन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाए तो धारा पिन से होते हुए कॉपर क्वायल में पहुंचे
  5. चित्र अनुसार क्वायल के नीचे चुम्बक को रख दे

डीसी मोटर बनाने की विधि स्टेप 3 तारो को जोड़ना

  1. लगभग आधा मीटर के दो तार ले
  2. दोनों तारों एक सिरे लकड़ी के स्तंभ में लगी पिन से जोड़ दें
  3. इनका दूसरा सिरा बैटरी के धनात्मक और ऋणआत्मक पोल से जोड़ दें
    जोड़ने के पश्चात Coil में धारा प्रवाहित होने लगेगी चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होने के कारण क्वायल तेजी से घूमने लगेगा

नमक का सूत्र क्या है ? नमक और जल के घोल के फायदे एव प्रमुख रासायनिक अभिक्रिया

नमक का सूत्र क्या है 

नमक हमारे दैनिक जीवन में सबसे अधिक प्रयोग में लायी जाती नमक का सूत्र  क्या है  ?  =  NaCl 
नमक का सूत्र क्या है
नमक का रासायनिक नाम सोडियम क्लोराइड  
 द्रवणांक  804 डिग्री सें आपेक्षिक घनत्व 2.16
अपवर्तनांक  10.542   कठोरता  2.5
कवाथानक 1,413 °C जल में विलेयता  359 g/L
अमोनिया में विलेयता  21.5 g/L Molar mass 58.44 g /mol
मेथेनाल में विलेयता  14.9 g/L उष्मीय छमता  36.79 J/(K – mol )

नमक का सूत्र (NaCl) + जल (H2O)

 नमक और जल को आपस में मिलाया जाता है तो नमक जल में घुल जाता है इस अभिक्रिया के उपरान्त NaOH (सोडियम हीड्राऑक्साइड),  Cl2 (क्लोरिन गैस), H2O प्राप्त होता है 
2NaCl + 2H2O = 2NaOH + Cl2 + H2O
नमक और पानी (जल) घोल के कई फायदे है जो निम्न है 
  • इस घोल का प्रयोग हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करने में किया जाता है 
  • खाना बनाने में 
  • रोगाणुरोधक में 

नमक का सूत्र (NaCl) + सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4)

अधिक मात्रा में NaCl  सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) मिलाने  सोडियम सलफेट (Na2SO4) और HCl बनाता है 
2NaCl + H2SO4 → 2HCl(g)+Na2SO4
कम मात्र में NaCl सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) मिलाने सोडियम बाई सलफेट   (NaHSO4) और HCl(g) गैस का बनाता है 

NaCl+H2SO4=NaHSO4+HCl

नमक का सूत्र (NaCl) + सोडियम हीड्राऑक्साइड  (NaOH)

नमक (NaCl), सोडियम हीड्राऑक्साइड (NaOH) का प्रयोग औधोग के छेत्र में क्लोरिन गैस (Cl2 ) और कास्टिक सोडा बनाने में प्रयोग किया जाता है 
 NaCl और NaOH के बीच एक “क्लासिक” संबंध है। “क्लोर-क्षार” के रूप में जाना जाने वाला एक प्रक्रिया समुद्री जल का इलेक्ट्रोलिसिस है। इस प्रक्रिया का उपयोग क्लोरीन गैस और कास्टिक सोडा (उद्योग की दुनिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण दो औद्योगिक रसायनों) उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यह दिलचस्प है क्योंकि इसमें मजबूत आधार के साथ एक मजबूत एसिड का उत्पादन शामिल है ..

चीनी का रासायनिक सूत्र और रासायनिक नाम है?

चीनी का रासायनिक सूत्र

चीनी हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग लायी जाती है। चीनी का रासायनिक सूत्र C12H22O11 होता है ।

इसमे कार्बोन के 12 हाइड्रोजन के 22 और ऑक्सीजन के 11 परमाणु से मिलकर बनता है 

 

चीनी का रासायनिक सूत्र

चीनी एक तरह का क्रिस्टल पदार्थ है। यह स्वाद में मीठा होता है जिसे गन्ना,चुकंदर आदि से प्राप्त किया जाता है। चीनी प्रमुख स्रोत गन्ना है।

चीनी के अधिक प्रयोग से मधुमेह की समस्या अधिक होती है। यह सभी जानते है लेकिन चीनी के अधिक प्रयोग से मोटापा , दातो का छरण समस्या होती है।

चीनी का रासायनिक सूत्र (C12H22O11) + जल का सूत्र  (H2O)2 C6H12O6

जब चीनी और जल हो मिलाया जाता है तब ग्लूकोस का निर्माण होता है।

C12H22O11 + H2O → 2 C6H12O6 (ग्लूकोस)
अन्य सूत्र
C12H22O11 + H2O → 4 C-IIH3C-IIH2OH + 4 CIVO2
8 C0 + 16 e- → 8 C-II (reduction)
4 C0 – 16 e- → 4 CIV (oxidatio)
C12H22O11 + H2O → CH3CH2OH + CO2
C12H22O11 + H2O → C2H5OH + CO2

ऊष्मा की परिभाषा, प्रकार, चालन, संवहन, विकिरण, संचरण की विधियां

ऊष्मा की परिभाषा || ऊष्मा के प्रकार || ऊष्मा संचरण की विधियां || ऊष्मा विकिरण || ऊष्मा का संवहन || ऊष्मा का चालन

ऊष्मा की परिभाषा :- 

उष्मा वह एनर्जी (उर्जा ) है । जो एक वस्तु से दूसरे वस्तु में टेंप्रेचर डिफरेंट ( तापांतर ) के कारण उत्पन्न होती है । 

  • उष्मा ( हिट ) सदैव ऊंचे ताप वाली वस्तु से नीचे ताप वाली वस्तु में प्रवाहित होती है। 
  • उष्मा का स्थानातरण तब तक होता रहता है। जब तक दोनों वास्तु का ताप सामान ना हो जाये।
ऊष्मा की परिभाषा

उष्मा का मात्रक :-  कैलोरी, किलोकैलोरी, जूल  

उष्मा की परिभाषा के उदाहरण :-

 लोहे ( Iron rod) का एक क्षण ले इसका एक सिरा जलती हुई मोमबत्ती के संपर्क (contact) में लाये। लोहे का पहला सिरा मोमबत्ती के संपर्क में लाने पर यह गर्म होने लगता है। कुछ देर तक लोहे की छड मोमबत्ती के संपर्क में रहने पर इसका दूसरा सिरा गर्म होने लगता है।

निष्कर्ष – 
इससे यह निष्कर्ष निकालता है। की जब लोहे की छड को गरम किया जाता है। तो मोमबती के लौ (Flam) के निकट  लोहे के अणु (Molecule) सबसे पहले गरम होते है। फिर सबसे गर्म अणु के पास के अणु गर्म होने लगते है। इस प्रकार ऊष्मा लोहे की छड के एक सिरे से दुसरे सिरे तक पहुच जाता है। ऊष्मा की परिभाषा – इससे यह सिद्ध होता है की ऊष्मा उच्च ताप से निम्न ताप की ओर बहती है।जैसा चल चित्र में दिख रहा है

ऊष्मा के प्रकार

उष्मा के निम्न प्रकार है। 

  1. विशिष्ट ऊष्मा 

यदि m द्रव्यमान कि किसी वस्तु को क्षमा Q देने पर वस्तु के ताप में △ t की वृद्धि होती है तो विशिष्ट ऊष्मा   Q s = ————— m✗🛆t    

  •  जल की विशिष्ट ऊष्मा सबसे अधिक होती है ।
  • जल की विशिष्ट ऊष्मा का मान 
  1. एक कैलोरी / ग्राम ०C 
  2.  1 किलो कैलोरी / ग्राम ०C  
  3.  4.2 メ 103 जूल / ग्राम ०C  

विशिष्ट ऊष्मा धारिता दो प्रकार की होती हैं।

नियत आयत पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता –  इनमें एम द्रव्यमान के लिए गए गैस का आयतन नियत रहता है। Sb से निरूपित करते हैं। नियत दांव पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता –  इनमें एम द्रव्यमान के लिए गए गैस का दाब नियत है इसे sp से निरूपित करते हैं।

गुप्त ऊष्मा-

  ऊष्मा (Heat) की वह मात्रा जो पदार्थ के 1 ग्राम के स्थिरता ताप (temprature) पर अवस्था परिवर्तन में व्यय होती है। उस पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। इसे L से प्रदर्शित किया जाता है इसके मात्रक कैलोरी प्रति ग्राम जूल प्रति ग्राम जूल प्रति किग्रा होते हैं।    

ऊष्मा संचरण की विधियां :-

उष्मा संचरण की निम्न तीन विधिय है। 

  • ऊष्मा का चालन

यह ऊष्मा संचरण की वह विधि है। जिसमे जब ठोस (Solid) को गरम किया जाता है। तो ठोस में उपस्थित अणु ( Molecule ) बिना अपना स्थान छोड़े ऊष्मा को दुसरे अणु को को स्थानांतरित कर देता है ।अथार्त ऊष्मा उच्च ताप से निम्न ताप की ओर बहती है। यह ऊष्मा का स्थानांतर ऊष्मा का चालन  कहलाता है। 


जैसा इस चित्र में धातु के अणु बिना स्थानांतरित हुए ऊष्मा को एक अणु से दुसरे अणु तक पहुचाते है। 

  • ऊष्मा का संवहन

यह ऊष्मा संवहन की वह विधि है। जिसमे किसी तरल या गैस को गरम किया जाता है। तो तरल के अणु ऊष्मा पाकर अपना स्थान छोड़ देते है। और ठण्डे अणु उनका स्थान लेते है। ऊष्मा के स्थानांतरण की यह क्रिया ऊष्मा का संवहन कहलाता है। 

इस विकर में रखे द्रव को जब गरम किया जाता तब विकर का निचला हिस्सा सबसे पहले गरम होता जो तली के सबसे नजदीकिय द्रव के अणु को गरम कर देता है। अब ये अणु गरम होने के बाद ऊपर की तरफ चले जाते है ।और उनके स्थान पर ठण्डे नए अणु आ जाते है। फिर वे ऊष्मा पाकर अपना स्थान छोड़ देते है यह क्रिया चलती रहती है। 

  • ऊष्मा विकिरण

ऊष्मा संचरण की वह विधि जिनको स्थानांतर के लिए माध्यम की आवस्यकता नहीं होती जैसे की ऊष्मा विकिरण द्वारा पृथ्वी पर आती है ।

  जैसा इस चित्र में दिखाया गया है की कैसे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर विकिरण द्वारा आता है।    

ऊष्मा की परिभाषा || ऊष्मा के प्रकार || ऊष्मा संचरण की विधियां || ऊष्मा विकिरण || ऊष्मा का संवहन || ऊष्मा का चालन

ऊष्मा की परिभाषा :- 

उष्मा वह एनर्जी (उर्जा ) है  जो एक वस्तु से दूसरे वस्तु में टेंप्रेचर डिफरेंट ( तापांतर ) के कारण उत्पन्न होती है   
 
  • उष्मा ( हिट ) सदैव ऊंचे ताप वाली वस्तु से नीचे ताप वाली वस्तु में प्रवाहित होती है 
  • उष्मा का स्थानातरण तब तक होता रहता है। जब तक दोनों वास्तु का ताप सामान ना हो जाये
ऊष्मा की परिभाषा

 

उष्मा का मात्रक :-  कैलोरी, किलोकैलोरी, जूल  

उष्मा की परिभाषा के उदाहरण :-

 

 लोहे ( Iron rod) का एक क्षण ले इसका एक सिरा जलती हुई मोमबत्ती के संपर्क (contact) में लाये लोहे का पहला सिरा मोमबत्ती के संपर्क में लाने पर यह गर्म होने लगता है कुछ देर तक लोहे की छड मोमबत्ती के संपर्क में रहने पर इसका दूसरा सिरा गर्म होने लगता है

निष्कर्ष – 
इससे यह निष्कर्ष निकालता है की जब लोहे की छड को गरम किया जाता है तो मोमबती के लौ (Flam) के निकट  लोहे के अणु (Molecule) सबसे पहले गरम होते है फिर सबसे गर्म अणु के पास के अणु गर्म होने लगते है इस प्रकार ऊष्मा लोहे की छड के एक सिरे से दुसरे सिरे तक पहुच जाता है ऊष्मा की परिभाषा – इससे यह सिद्ध होता है की ऊष्मा उच्च ताप से निम्न ताप की ओर बहती है जैसा चल चित्र में दिख रहा है

ऊष्मा के प्रकार

उष्मा के निम्न प्रकार है 
  1. विशिष्ट ऊष्मा 

यदि m द्रव्यमान कि किसी वस्तु को क्षमा Q देने पर वस्तु के ताप में △ t की वृद्धि होती है तो विशिष्ट ऊष्मा

 

Q

s = —————

m✗🛆t

 
 

  •  जल की विशिष्ट ऊष्मा सबसे अधिक होती है ।
  • जल की विशिष्ट ऊष्मा का मान 

    1. एक कैलोरी / ग्राम ०C 
    2.  1 किलो कैलोरी / ग्राम ०C  
    3.  4.2 メ 103 जूल / ग्राम ०C  

विशिष्ट ऊष्मा धारिता दो प्रकार की होती हैं

 

नियत आयत पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता –  इनमें एम द्रव्यमान के लिए गए गैस का आयतन नियत रहता है Sb से निरूपित करते हैं

नियत दांव पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता –  इनमें एम द्रव्यमान के लिए गए गैस का दाब नियत है इसे sp से निरूपित करते हैं

गुप्त ऊष्मा-

 

ऊष्मा (Heat) की वह मात्रा जो पदार्थ के 1 ग्राम के स्थिरता ताप (temprature) पर अवस्था परिवर्तन में व्यय होती है उस पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहलाती है इसे L से प्रदर्शित किया जाता है इसके मात्रक कैलोरी प्रति ग्राम जूल प्रति ग्राम जूल प्रति किग्रा होते हैं  

 

ऊष्मा संचरण की विधियां :-

उष्मा संचरण की निम्न तीन विधिय है 
  • ऊष्मा का चालन
यह ऊष्मा संचरण की वह विधि है जिसमे जब ठोस (Solid) को गरम किया जाता है तो ठोस में उपस्थित अणु ( Molecule ) बिना अपना स्थान छोड़े ऊष्मा को दुसरे अणु को को स्थानांतरित कर देता है अथार्त ऊष्मा उच्च ताप से निम्न ताप की ओर बहती है यह ऊष्मा का स्थानांतर ऊष्मा का चालन  कहलाता है 

 


जैसा इस चित्र में धातु के अणु बिना स्थानांतरित हुए ऊष्मा को एक अणु से दुसरे अणु तक पहुचाते है 

 
  • ऊष्मा का संवहन
यह ऊष्मा संवहन की वह विधि है जिसमे किसी तरल या गैस को गरम किया जाता है तो तरल के अणु ऊष्मा पाकर अपना स्थान छोड़ देते है और ठण्डे अणु उनका स्थान लेते है ऊष्मा के स्थानांतरण की यह क्रिया ऊष्मा का संवहन कहलाता है 

इस विकर में रखे द्रव को जब गरम किया जाता तब विकर का निचला हिस्सा सबसे पहले गरम होता जो तली के सबसे नजदीकिय द्रव के अणु को गरम कर देता है अब ये अणु गरम होने के बाद ऊपर की तरफ चले जाते है और उनके स्थान पर ठण्डे नए अणु आ जाते है फिर वे ऊष्मा पाकर अपना स्थान छोड़ देते है यह क्रिया चलती रहती है 
  • ऊष्मा विकिरण
ऊष्मा संचरण की वह विधि जिनको स्थानांतर के लिए माध्यम की आवस्यकता नहीं होती जैसे की ऊष्मा विकिरण द्वारा पृथ्वी पर आती है 

 
जैसा इस चित्र में दिखाया गया है की कैसे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर विकिरण द्वारा आता है
 
 
 

ऊर्जा संरक्षण के उपाय 0% से 95% तक विधुत, एलपीजी, पेट्रोलियम उर्जा बचाए इन आसन विधि से

                                 ऊर्जा संरक्षण के उपाय

इस आर्टिकल में उर्जा संरक्षण के उपाय के विषय में बताया गया है 
ऊर्जा संरक्षण के उपाय 0% से 95% तक विधुत, एलपीजी, पेट्रोलियम उर्जा बचाए इन आसन विधि से 1

विधुत ऊर्जा संरक्षण के उपाय :-

विधुत उर्जा संरक्षण के उपाय

  • आवस्यकता ना होने पर विधुत से चलने वाले उपकरण बंद (Close) कर देना चाहिए।  
  • हमेशा LED TV का प्रयोग करे और टीवी,  रिमोट से बंद करने के बजाय इसे स्विच से बंद करे
  • मोबाइल (Mobile) या लैपटॉप (Laptop) चार्जर बंद कर देना चाहिए जब इसका पयोग ना हो। जैसे आप की मोबाइल चार्ज हो जाये तो चार्जर बंद कर देना चाहिए। 
  • मोबाइल फ़ोन में हमेशां battery saving app का प्रयोग करे
  • साधारण बल्ब प्रयोग करने के बजाय LED बल्ब का प्रयोग करे। क्यों LED BULB 95% तक बिधुत बचाते है। जिससे विधुत का बिल कम आयेगा
  • LED,CFL पर जमी धूल को हमेसा साफ़ करते रहना चाहिए। क्योकि बल्ब पर धुल ज़माने से प्रकाश कम प्राप्त होता है
  • ऐसे LED बल्ब का प्रयोग करना चाहिए जिसका प्रकाश 360० तक फैले। 
  • दिन के समय नेचुरल लाइट का ही प्रयोग करे। 
  • पंखा (Fan) कूलर (Cooler) आदि को समय-समय पर ग्रीसिंग करवाते रहे। इससे विधुत उपकरण मुक्त रूप से चलते है। और विधुत की बचत आधिक होती है। 
  • विधुत सामान ISI मार्क देखकर ले ये बिधुत की बचत करते है। 
  • गिसर से विधुत की खपत आधिक होती है इसे 45 से 50 हीटिंग मूड में रखे। 
  • रेफ्रिजेरेटर के द्वारा विधुत की खपत अधिक होती है। विधुत की खपत तब अधिक हो जाती है। जब इसके पीछे लगे कुलिंग क्वाइल पर धूल जम जाती हो। अर्थात AC और Refrigerators  सफाई निरंटर करते रहने चाहिए। 
  • AC को बाहर न लगाकर इसे सेड से ढक देना चाहिए। 
Conclusionउपरोक्त लेख से ये बताया गया है आवश्यक्ता न होने पर विधुत उपकरण को प्रयोग में ना ले इनकी निरंतर सफाई, देख-भाल करते रहे ISI मार्का देखकर विधुत उपकरण ख़रीदे 

LPG गैस ऊर्जा संरक्षण के उपाय

LPG गैस उर्जा संरक्षण के उपाय
 हम जानेगे की रसोई गैस की बचत कैसे कर सकते है। रसोई गैस संरक्षण के के तरीके निम्न है।
  • जब भी हम चावल (Rice)) दाल या ऐसे कोई भी पकवान बनाये। जिन्हें कुछ टाइम पहले भिगोना सम्भव हो इन्हे भिगोकर बनाना चाहिए। ताकि कम गैस, कम समय (Time) में पकवान बनकर रेडी हो जाये। 
  • यदि हम कड़ाई की जगह पर प्रेसर कुकर (Pressure cooker) का यूज़ करे खाना जल्दी रेडी  जाता है। क्योकि कड़ाई में खाना बनाने में बहुत टाइम और गैस लग जाता है।  प्रेसर कुकर में वाटर (Water) का ताप जल्दी बढ़ जाता है। जिससे खाना जल्दी बन जाता है। 
  •  गैस का बर्नर (Burner) हमेसा क्लीन (clean) रखना चाहिए। अक्सर चाय या दूध बॉईल होकर निचे गिर कर गैस के बर्नर में जम जाता है। जिससे गैस का फ्लो कम होता  है। गैस की खपत अधिक होती है। गैस बर्नर हमेसा साफ़ रखना चाहिए। 
  • खाना बनाते समय पानी उतना ही डाले जितने की आवश्यकता अधिक पानी हो जाने पर जलने में ज्यादा समय और गैस दोनों लगता है।
  • खाना हमेशा ढक कर बनाये। 
  • फ्रिज में रखे सामान जैसे पनीर सब्जी को तुरंत न बनाये उसे नार्मल ताप (Normal Temperature) पर आने दे। फिर बनाये क्योकि बहुत अधिक ठंडे सामान (सब्जी, पनीर) को गरम करने में समय लगता है। गैस की अधिक खपत होती है ।
  • खाना जब बनाकर तैयार हो जाये रेगुलेटर (Regulator) बंद कर देना चाहिए। 
  • हमेशा इंडक्शन कुकर (Induction cooker) में ही खाना बनाये इस प्रकार के कुकर जल्दी हीट होते है। 
  • गैस पीले रंग के लौ के साथ जल रही हो तो इसका अर्थ है। की गैस पूर्ण रूप के नहीं जल रहा है। 

पेट्रोलियम ऊर्जा संरक्षण के उपाय

Petroleum उर्जा संरक्षण के उपाय
  • कार, मोटर साइकिल को तीसरे – चौथे गियर पर कांस्टेंट स्पीड (Constant speed) में चलाये ।
  • कार चलाते समय कार के खिड़की – दरवाजे बंद रखना चाहिए। ऐसा ना करने पर कार में हवा का दबाव बढ़ जाता है। जिससे हवा के विरोध में कार को अधिक काम करना पढ़ता है। फ्यूल (fuel) की खपत अधिक होती है। 
  • लोगो का मानना ये है। की टायर में हवा का दाब आधिक रखने से फ्यूल की खपत कम होती है। ये तथ्य सही है। लेकिन टायर में ज्यादा प्रेसर (Pressure) होने के कारण ब्रेक (Break) देर से लगता है दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है ।
  • यदि संभव हो बार-बार ब्रेक, त्वरित (Acceleration) का ना करे इससे फ्यूल ज्यादा बर्न होता है।   
  • फ्यूल सर्वोत्तम गुणों का प्रयोग करे ।
  • वाहन के इंजन की समय – समय पर जाँच करवाते रहे ।
  • यदि वाहन से अधिक आवाज आ रही है। तो इसका अर्थ ये है। की वाहन के इंजन में ग्यादा फ्रिक्शन (Friction) हो रहा है जिससे फ्यूल ग्यादा बर्न होगी वाहर की जाच कराये ।
  • वाहन से आधिक धुआ (smoke) आने पर इसकी जाँच कराये
  • ट्राफिक पर रेड लाइट के दौरान वहां बंद कर दे 

प्रकाश ऊर्जा संरक्षण के उपाय

प्रकाश उर्जा संरक्षण के उपाय
प्रकाश उर्जा की बचत हमारे लिए महत्वपूर्ण इस लिए है। क्योकि इसकी  बचत से विधुत बिल कम आता है। और बची हुई बिजली का प्रयोग अन्य नए छेत्रो में होता है। जहाँ विधुत लाइन अभी तक ना पहुची हो।
प्रकाश ऊर्जा संरक्षण के उपाय निम्न है ।
  • साधारण बल्ब के स्थान पर LED बल्ब का प्रयोग करे। 
  • दिन के समय प्राकृतिक प्रकाश (Natural Light) का प्रयोग करे ।
  • बल्ब पर जमी धुल को साफ करते रहे। 

जल संरक्षण के उपाय 

ऊर्जा संरक्षण के उपाय 0% से 95% तक विधुत, एलपीजी, पेट्रोलियम उर्जा बचाए इन आसन विधि से 2
  • जब भी ब्रश करे, बर्तन धोये आवश्यकता ना होने पर नल बंद (close) कर दे ।
  • शावर के स्थान पर बाल्टी (bucket) का प्रयोग करे
  • नल लीक (leak) होने की स्थिति में उसे तुरंत ठीक कराये।
  • कम पानी की खपत वाली वाशिंग मशीन का प्रयोग करे ।
  • पौधों में पानी water केन से डाले इससे पानी की बचत होती है ।
  • घर में water मीटर लगवाए इससे पानी की बर्बदी का पता लग सके।

द्रव्यमान संरक्षण का नियम

      द्रव्यमान संरक्षण का नियम या द्रव्य की अविनाशिता का नियम क्या है।

      द्रव्यमान संरक्षण का नियम

      द्रव्यमान संरक्षण का नियम या द्रव्य की अविनाशिता का नियम क्या है। 3

        द्रव्यमान संरक्षण का नियम या द्रव्य की अविनाशिता का नियम एक ऐसा सिद्धांत (Theory) है।  जो ये बताता है।  की ब्रह्माण्ड (Universe) में उपस्थित किसी भी द्रब्य का द्रब्यमान (mass) नियत हिता है। अर्थात द्रब्य ना तो नष्ट (Destroyed) हो सकता है ।  ना ही उत्पन्न (Generated)।  क्या आप सोच रहे है। द्रब्य के द्रब्यमान को नष्ट किया जा सकता है। आप गलत सोच रहे है। क्योकि द्रब्य को परिवर्तित (Changed) किया जा सकता है। ना की इसे नष्ट (Destroyed) किया जा सकता है।

      द्रव्यमान संरक्षण का नियम किसने दिया था :-

        इस नियम का प्रतिपादन (Rendering) रासायनिक वैज्ञानिक लॉमनोसॉव ने किया इसके बाद लेवाशिये ने इस नियम की पुष्टि की।  

      द्रव्यमान संरक्षण का नियम के महत्वपूर्ण तथ्य :-

      • इस नियम के अनुसार एक अलग प्रणाली में द्रब्यमान (mass) को ना तो बनाया ना ही किसी रासायनिक अभिक्रिया (Chemical reactions) द्वारा नष्ट किया जा सकता है।  
      • इस नियम के अनुसार रासायानिक अभिक्रिया में उत्पादों (Product) के द्रब्यमान अभिक्रिया के द्रब्यमान के बराबर होता है।  
      • इस नियम का प्रयोग कई गणनाओं में प्रयोग होता है।  जैसे अभिक्रिया के दौरान उपभोग (Consumption) या उत्पादित गैस (Produced gas) की मात्रा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।  

      उदहारण :- AgNOз + NaCl ⟶ AgCl + NaNOз क्रिया से पहले AgNOз तथा NaCl का सयुक्त द्रब्यमान क्रिया के के बाद प्राप्त AgCl + NaNOз के सयुक्त द्रव्यमान बराबर है। H₂S + Cl₂ ⟶ 2HCl + S क्रिया से पहले H₂S तथा Cl₂ का सयुक्त द्रब्यमान क्रिया के के बाद प्राप्त 2HCl + S के सयुक्त द्रव्यमान बराबर है। 2KI + Cl₂ ⇾ 2KCl + I₂ क्रिया से पहले KI तथा Cl₂ का सयुक्त द्रब्यमान क्रिया के के बाद प्राप्त 2KCl + I₂ के सयुक्त द्रव्यमान बराबर है।

      इतिहास :-  प्राचीन यूनानियों ने अपना प्रस्ताव दिया था की ब्राह्मण के सभी पदार्थो का द्रव्यमान नियत होता है इसके बाद भौतिक बैज्ञानिक लैवोजियर 1789 में द्रव्यमान के संरक्षण सिद्धांत दिया।  

        वृत्तशीर्षाभिमुख कोण की परिभाषाआसन्न कोण की परिभाषासंपूरक कोण किसे कहते हैं