ओम का नियम की परिभाषा | अनुगमन वेग के आधार पर ओम के नियम की व्युत्पत्ति

ओम का नियम की परिभाषा

यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था जैसे ताप में कोई परिवर्तन ना हो तो चालक के सिरे पर लगाए गए विभवांतर तथा उनमें बहने वाली धारा का अनुपात नियत रहता है। ओम का नियम की परिभाषा

ब्याख्या 

कुछ  चालकों पर लगा विभवांतर तथा उनमें प्रवाहित धारा का अनुपात कभी नहीं बदलता है।
जब किसी चालक के सिरों के बीच विभवांतर स्थापित किया जाता है। तो चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। सन 1826 मैं जर्मन वैज्ञानिक जान साइमन ओम ने किसी चालक के सिरों पर लगाए गए विभवांतर तथा उन में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा का संबंध एक नियम के द्वारा व्यक्त किया जिसे ओम का नियम कहते हैं। वैज्ञानिक ओम के अनुसार किसी चालक में जितना विभवांतर स्थापित किया जाता है। उतनी ही धारा प्रवाहित होती है। अर्थात किसी चालक पर लगाया गया विभवांतर तथा चालक में प्रवाहित धारा का अनुपात सदैव नियत रहता है।

ओम का नियम के सूत्र 

माना किसी चालक के सिर पर लगाया गया विभवांतर  V हो तो तथा उस में बहने वाली विद्युत धारा i है। R एक नियतांक है ओम के नियम के अनुसार

V ∝ i 
V = iR

जहाँ V विभवांतर और i विधुत धारा है

ओम का नियम

    इस प्रकार यह कहा जा सकता है। कि जब तक किसी चालक का ताप तथा अन्य भौतिक अवस्थाएं नहीं बदलती, तब तक चालक का प्रतिरोध नियत रहता है। चाहे चालक के सिरों के बीच कितना भी विभवांतर क्यों ना लगाया जा यदि चालक पर लगाए गए विभवांतर वी तथा चालक में प्रवाहित धारा आई के बीच ग्राफ खींचा जाए तो एक सरल रेखा प्राप्त होगी

 

अनुगमन वेग के आधार पर ओम के नियम की व्युत्पत्ति

  चालक में मुक्त इलेक्ट्रान अनुगमन वेग से क्षेत्र की दिशा के विपरीत गति करने लगता है। माना l लंबाई तथा A अनुप्रस्थ काट का कोई चालक है जिसमें मुक्त इलेक्ट्रान घनत्व अर्थात इस के एकांक आयतन में उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n है। इस चालक के सिरों पर V विद्युत विभवांतर स्थापित करने पर चालक में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। जिसके फलस्वरुप चालक में मुक्त इलेक्ट्रान अनुगमन वेग Vd से क्षेत्र की दिशा के विपरीत गति करने लगते हैं। अतः चालक में इसके परिणाम स्वरुप विद्युत धारा i मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति की दिशा के विपरीत प्रवाहित होने लगते हैं। धारा तथा अनुगमन वेग में निम्नलिखित संबंध होता है। i = neAVd तथा चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग तथा शांति काल में निम्नलिखित संबंध होता है। Vd = eVj / ml जहां e = इलेक्ट्रॉन का आवेश M = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान J = इलेक्ट्रॉन का क्रांतिकारी समीकरण 2 से Vd  का मान समीकरण 1 में रखने पर I = neA (eVj / ml) = ( neAj / ml ) V V / i = ml / ne2 Aj समीकरण 3 के दाएं पक्ष की राशि में चालक विशेष के लिए l, A, n  नियत तथा m व e स्वयं नियतांक है। और यदि चालक का तापमान स्थिर रहे तो j  भी नियत रहेगा। अतः निश्चित आप पर अर्थात यदि चालक की भौतिक अवस्थाएं नियत है तो तो शमी करती के दाएं पक्ष की राशि ( ml/ne2Aj) एक नियतांक होगी यही चालक का विद्युत प्रतिरोध R  होगा । R = ml / ne2 Aj V /i =R

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This Post Has 4 Comments

  1. OK good post please update more post

  2. बहुत ही अच्छा है

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